श्रीकृष्ण ने अघासुर को सर्प योनि से मुक्ति प्रदान कर किया उद्धार | श्री कृष्ण उद्धार कथा
May 9, 2026•Channel
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Published1 month ago
Duration23:42
Video IDEMeN3kXj714
Languagehi
CategoryFilm & Animation
PrivacyPublic
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Video TypeRegular Video
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Description
श्री कृष्ण उद्धार कथा के इस कड़ी में अघासुर (विशालकाय अजगर) से जुड़े प्रसंग का वर्णन किया जा रहा है। अपने एक से एक मायावी दैत्यों के वध के बाद बकासुर जैसे दैत्य का भी वध श्रीकृष्ण के द्वारा किए की सूचना से कंस विचलित हो जाता है। वह समझ जाता है कि श्रीकृष्ण कोई और नहीं अष्ट भुजा देवी की भविष्यवाणी में व्यक्त किया गया उसका काल है। कंस अपने इस भय से मुक्ति पाने का उपाय अपने मंत्रियों से पूछता है। मंत्री चाणूर के सुझाव पर पूतना और बकासुर के बड़े भाई मायावी अघासुर - धरती का सबसे बड़े अजगर (सर्प) को बुलाया जाता है। वह सभा में प्रकट होता है और कंस का आदेश मिलते ही अपने भाई और बहन का वध हो जाने से प्रतिशोध की ज्वाला में जल रहा मायावी विशालकाय अघासुर गोकुल पहुँच कर उस स्थान में अपने मुख को गुफा का स्वरूप देकर बैठ जाता है, जहाँ पर श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ प्रतिदिन खेलने के लिए आते है। श्रीकृष्ण के सखा उत्सुकता वश उस गुफा में प्रवेश करने लगते है। लेकिन श्रीकृष्ण अपनी दिव्य दृष्टि उसे पहचान लेते है और अंत में वह भी अघासुर के गुफा रूपी मुख में प्रवेश कर जाते है। श्रीकृष्ण के प्रवेश करते ही अघासुर अपना मुख बंद कर लेता है, जिससे सबका दम घुटने लगता है। अपने सखाओं को बेसुध देख श्रीकृष्ण अपने शरीर को बड़ा करके अघासुर का मुख फाड़ कर उसकी जीवन लीला समाप्त कर देते है। अघासुर का अंत होते ही उसकी दिव्य आत्मा श्रीकृष्ण को प्रणाम करते हुए प्रकट होती है और उन्हें बताती है कि वह उनके स्पर्श से कई युगों के पश्चात आज महर्षि अष्टावक्र का श्राप से मुक्त हो पाया है और उसके समस्त पापों का नाश हो गया है। क्योंकि वह युगों पहले अदैत्य शंखासुर का पुत्र था। जिसे अपने कामदेव के समान अपने शरीर की सुन्दरता का बड़ा ही अहंकार था। इसी अहंकार वश जब उसने एक दिन महर्षि अष्टावक्र के टेढ़े-मेढ़े शरीर का उपहास किया, तो महर्षि ने क्रोध में आकर उसे अजगर बन जाने का श्राप दे दिया। श्राप मिलने पर उसे अपनी भूल का आभास हुआ और महर्षि से क्षमा माँगने लगा। तब महर्षि ने उसे ज्ञान देते हुए कहा है कि संसार में प्रकृति के नियम अनुसार सबको शरीर प्राप्त होता है, इसलिए उसे इसे प्रभु की लीला समझ कर उपहास नहीं करना चाहिए। लेकिन अब मेरा श्राप तो टल नहीं सकता, किंतु द्वापर के अंत में जब भगवान श्री कृष्ण धरती पर पधारेंगे तब उनके चरण स्पर्श से तेरे सर्प शरीर का अंत हो जाएगा और उनके दर्शन के फल स्वरूप तू पाप वृत्ति से मुक्ति प्राप्त करके उन्हीं की ज्योति में समा जाएगा। इस प्रसंग को विस्तार से बताने के पश्चात अघासुर की आत्मा श्री कृष्ण से उनके चरणों की रज में विलीन होने प्रार्थना करती है। इस पर श्री कृष्ण कहते है कि समस्त प्राणियों की शरीर अहंकार से निर्मित एक बुलबुले की भाँति होता है जिसमें मेरा प्रतिबिंब ही जीवात्मा कहलाता है। जब अहंकार का नाश होने से बुलबुला फूट जाता है तब वो प्रतिबिंब वापस अपने बिंब में विलीन हो जाता है, इसी को मुक्ति कहते हैं। अंत में श्रीकृष्ण तथास्तु कह कर अघासुर की आत्मा को अपने में समाहित कर लेते है। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने अघासुर को सर्प योनि से मुक्ति प्रदान कर उसका उद्धार किया।
"भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण का जीवन का उद्देश्य कंस के वध और महाभारत के युद्ध तक सीमित नहीं था, बल्कि अपनी विभिन्न लीलाओं के माध्यम से धर्म, करुणा, प्रेम और न्याय का संदेश प्रदान करना था। अपने भक्तों और मानवता के लिए संकट बनें अधर्मियों का विनाश करके मानव में ईश्वर के प्रति आस्था, श्रद्धा और विश्वास को मजबूत करना था। उन्होंने सिखाया कि जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब-तब ईश्वर मानव कल्याण के लिए अवतार लेते हैं। उनके द्वारा श्रीमद्भागवत के माध्यम से दिए गीता के उपदेश की प्रासंगिकता को अन्य धर्म को मानने वालों ने भी स्वीकार किया। उन्होंने अपने जीवन में अपने भक्तों के साथ शत्रुओं का भी उद्धार किया था। आपका प्रिय धार्मिक चैनल तिलक उन उद्धार कथाओं संकलित करके आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा है, जिसका आप भक्ति भाव से आनन्द ले और तिलक से जुड़े रहे। जय श्री कृष्णा
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