तवायफ और हकीम की चुनावी जंग(मजेदार लखनवी किस्सा ) Kavi kumar manoj

Jan 23, 2026Channel
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Published5 months ago
Duration6:42
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Languagehi
CategoryPeople & Blogs
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Video TypeRegular Video

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Description

1957 का लखनऊ… जहाँ चुनाव सिर्फ़ राजनीति नहीं था, बल्कि तहज़ीब, अदब और नज़ाकत का मुकाबला था। यह कहानी है लखनऊ नगर पालिका चुनाव की — जहाँ एक तरफ़ थीं महफ़िलों की रौनक, हुस्न और शायरी की पहचान — दिलरुबा जान, और दूसरी तरफ़ थे चौक के मशहूर हकीम — दवा और दुआ के भरोसे — हकीम शम्शुद्दीन साहब। उस दौर में गली-गली गूँज रहा था एक शेर— “दिल तो दीजे दिलरुबा को, वोट शम्शुद्दीन को।” इस वीडियो में आप जानेंगे — ▪️ 1957 के लखनऊ की तहज़ीब और संस्कृति ▪️ तवायफ़ों का सामाजिक और सांस्कृतिक योगदान ▪️ दिलरुबा जान और हकीम शम्शुद्दीन की ऐतिहासिक टक्कर ▪️ उस दौर के अख़बारी किस्से और लोककथाएँ ▪️ लखनऊ की गलियों में गूँजती शायरी और चुनावी नारे ▪️ और वो राजनीति, जिसमें गाली नहीं — ग़ज़ल हुआ करती थी यह सिर्फ़ चुनाव की कहानी नहीं है, यह लखनऊ की रूह की कहानी है। अगर आपको इतिहास, किस्सागोई और लखनऊ की तहज़ीब पसंद है — तो वीडियो को लाइक करें 👍 चैनल को सब्सक्राइब करें 🔔 और इस वीडियो को ज़रूर शेयर करें।

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