इंद्रप्रस्थ की स्थापना के बाद पाण्डवों का राजसूय यज्ञ | शिशुपाल का वध | Shri Krishna Jeevani
May 17, 2026•Channel
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Published1 month ago
Duration1:01:07
Video IDGkkCc_OJ65s
Languagehi
CategoryFilm & Animation
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Description
नवनिर्मित इंद्रप्रस्थ के राजमहल में मंगल गीतों व वैदिक मंत्रोच्चार के बीच युधिष्ठिर का राज्याभिषेक किया जाता है। श्रीकृष्ण शुभकामनाओं के साथ उन्हें नौलखा हार भी भेंट करते है। उसी संध्या स्वर्ग से पधारे देवर्षि नारद मुनि पाण्डवों को बताते है कि उनके स्वर्गवासी पिता पाण्डव अपने पुत्रों की नई राजधानी के निर्माण से प्रसन्न है, लेकिन उनके मन में अपने जीवन में राजसूय यज्ञ नहीं करा पाने की वेदना अभी भी है। युधिष्ठिर अपने पिता का मर्म को समझ जाते है और राजसूय यज्ञ करने का संकल्प लेते हैं। तत्पश्चात युधिष्ठिर श्रीकृष्ण और भाइयों के राज सूय यज्ञ की रणनीति बनाने लगते हैं। आर्यावर्त के शक्तिशाली राज्य मगध पर विजय पाने की भार भीम और हस्तिनापुर पर विजय पाने का भार अर्जुन उठाने की इच्छा व्यक्त करते है। लेकिन श्रीकृष्ण पारिवारिक राज्य हस्तिनापुर को युद्ध से नहीं तातश्री धृतराष्ट्र से आशीर्वाद माँग कर जीतना उचित ठहराते है और आर्यावर्त के छियासी राजाओं को अपने भुजबल से बंदी बनाकर रखने वाले और सबसे बड़ी सेना के स्वामी मगध के राजा जरासंध को सैन्य युद्ध से नहीं बल्कि उसको मल्लयुद्ध से पराजित करने के लिए भीम और अर्जुन के साथ ब्राह्मण वेश में मगध पहुँच जाते है और अपनी बातों की चतुराई से दानवीर जरासंध को फंसा कर भीम के साथ द्वन्द्व युद्ध करने के लिए उकसा देते है। भरी सभा में जरासंध और भीम के बीच पहले गदा युद्ध होता है, जिससे निर्णय न होता देख मल्लयुद्ध प्रारम्भ होता है। भीम मल्लयुद्ध में जरासंध को धूल चटाने के बाद श्रीकृष्ण से संकेत मिलते ही जरासंध के पैर चीरकर उसे शरीर के दो टुकड़े कर देता हैं। लेकिन शिव जी के वरदान के कारण दोनों टुकड़े पुनः आपस में जुड़ जाते हैं। ऐसा कई बार होने से भीम परेशान हो जाता है, तब श्रीकृष्ण पत्ते के दोनों टुकड़ों को विपरीत दिशा में फेंक कर भीम को नया संकेत देते हैं। भीम उनका संकेत समझ जाते हैं और अगली बार वह जरासंध को चीरने के बाद उसके शरीर के दोनों टुकड़े विपरीत दिशा में फेंकते हैं। इस बार दोनों टुकड़े आपस में जुड़ नहीं पाते है और कुछ देर तड़पने के बाद उसका शरीर शान्त हो जाता है। जरासंध की मृत्यु के बाद उसके पुत्र सहदेव मगध का राजा बना दिया जाता है और कारागार में बंदी सभी छियासी बन्दी राजाओं को मुक्त कर दिया जाता है। वे सभी इंद्रप्रस्थ नरेश महाराज युधिष्ठिर की सत्ता के आधीन रहना स्वीकारते हुए राजसूय यज्ञ का निमंत्रण स्वीकार कर लेते है। जरासंध वध का समाचार मिलने से हस्तिनापुर में चिंताएं बढ़ जाती है और स्थिति को देखते हुए धृतराष्ट्र दुर्योधन को समझाने का कार्य शकुनि को सौंपता है। कुटिल शकुनि यहाँ भी अपनी चाल चलते दुर्योधन को समझाता है कि वह राजसूय यज्ञ में युधिष्ठिर का छोटा भाई बनकर सम्मिलित हो और किसी तरह से बलराम को चिकनी चुपड़ी बातों में फंसा कर अपना गुरु बना ले, जो उसे गदा युद्ध में प्रवीण कर देगा और जिससे समय आने पर भीम भी उसके सामने घुटने टेक देगा। पूरे विधि विधान के साथ इंद्रप्रस्थ में राजसूय यज्ञ आरम्भ होता है, जिसमें समस्त आर्यावर्त के राजा पधारते है। अग्रपूजा के लिए श्रीकृष्ण का नाम आने चेदि नरेश शिशुपाल अपना आपा खो बैठता है और श्रीकृष्ण के लिए अपशब्दों का प्रयोग करने लगता है। श्रीकृष्ण शिशुपाल को उसकी माता को दिए हुए वचन की बात बताते हुए कहते है कि तुम्हारे अपराध गिन रहा हूँ और सौ पूरे होने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। लेकिन शिशुपाल अपने अपशब्दों से अपमान करना जारी रखता है और जैसे ही वह सौंवा अपशब्द बोलता है, श्रीकृष्ण विवश होकर सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का शीश काट देते हैं। यह देख दुर्योधन और शकुनि भयभीत हो जाते है। शिशुपाल वास्तव में अपने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु का पार्षद जय था, जो इस जन्म में श्रीकृष्ण के हाथों श्राप मुक्त होकर माता लक्ष्मी द्वारा भेजे गए दिव्य विमान पर बैठ कर वापस बैकुण्ठ धाम को चला जाता है।
सम्पूर्ण जगत में भगवान विष्णु के आठवें अवतार एवं सोलह कलाओं के स्वामी भगवान श्री कृष्ण काजीवन धर्म, भक्ति, प्रेम, और नीति का अद्भुत संगम है। वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में कारागार में जन्म लेकर गोकुल की गलियों में यशोदा और नंदबाबा के यहाँ पलने वाले, अपनी लीलाओं, जैसे पूतना वध, माखन चोरी, राधा के संग प्रेम, गोपियों के साथ रासलीला और कालिया नाग के दमन के लिए प्रसिद्ध श्री कृष्ण ने युवावस्था में मथुरा कंस का वध करके जनमानस को उसके अत्याचार से मुक्त कराया एवं स्वयं के लिए द्वारका नगरी स्थापना भी की। उनका जीवन केवल लीलाओं तक सीमित नहीं था। उन्होंने समाज को धर्म और कर्म का गूढ़ संदेश देने के लिए महाभारत के युद्ध में पांडवों का मार्गदर्शन किया और अर्जुन के सारथी बनकर उसे "श्रीमद्भगवद्गीता" का उपदेश दिया, जो आज भी जीवन की समस्याओं का समाधान बताने वाला महान ग्रंथ माना जाता है। श्री कृष्ण का जीवन प्रेम, त्याग, और नीति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। आपका प्रिय चैनल "तिलक" श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ा यह विशेष संस्करण "श्री कृष्ण जीवनी" आपके समक्ष प्रस्तुत है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ी कथाओं का संकलन किया गया है। भक्ति भाव से इनका आनन्द लीजिए और तिलक से जुड़े रहिए।
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