'डेयरी का कचरा' क्यों कहे जाते हैं बछड़े? [The Fate of Bull Calves in Europe] DW Documentary हिन्दी
Mar 12, 2026•Channel
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Published3 months ago
Duration25:56
Video IDa4vdY3i_FZQ
Languagehi
CategoryScience & Technology
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Video TypeRegular Video
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गाय दूध दे, इसके लिए उसका बछड़े को जनना ज़रूरी होता है. बछिया तो आगे चलकर दुधारू गाय बन जाती हैं, लेकिन बछड़ों को डेयरी इंडस्ट्री में ‘बेकार’ माना जाता है. उन्हें ट्रकों पर लादा जाता है और फिर वे बड़ा तकलीफ़देह सफ़र तय करके मोटा करने वाले फ़ार्म्स पर पहुंचते हैं. और कभी-कभी तो यूरोप के बाहर भी.
लेकिन एक किसान, एक वैज्ञानिक और एक क़साई यह सिस्टम बदलना चाहते हैं. वे बछड़ों को सोया या मक्का खिलाकर मोटा करने वाले फ़ैक्ट्री फ़ार्मों में भेजने के बजाय आल्प्स के चरागाहों में भेज रहे हैं.
दक्षिणी जर्मनी में दूध उत्पादक मार्सेल रेन्त्स कुछ किसानों, रेस्टोरेंट मालिकों और दुकानदारों के छोटे से समूह के साथ मिलकर डेयरी सिस्टम को बदलने की कोशिश कर रहे हैं. वह चाहते हैं कि बछड़ों के साथ बेहतर सलूक हो और उन्हें तकलीफ़देह लंबे सफ़र पर न भेजा जाए. साथ ही, इससे हाई क्वॉलिटी मांस मिले, जिसके लिए ग्राहक थोड़ा ज़्यादा दाम देने को भी तैयार हों.
क़साई हानेस ह्योनेगर के ग्राहकों को यही ख़ास सुविधा मिलती है. वह उन पारंपरिक ऑर्गैनिक फ़ार्म्स के साथ काम करते हैं, जो डुअल-पर्पज़ कही जाने वाली नस्लें पालते हैं. यानी ऐसी गायें, जो सिर्फ़ दूध के लिए ही नहीं, बल्कि मांस के लिए भी पाली जाती हैं. दूध और मांस उद्योग अलग-अलग होने से पहले ऐसी ही नस्लें पाली जाती थीं. इन्हें चारा नहीं खिलाया जाता, बल्कि सीधे चरागाह में ही घास चरने दिया जाता है. इससे आल्प्स की पहाड़ियों में आलगॉय से लेकर साउथ टिरोल तक प्रकृति के संरक्षण में भी मदद मिलती है.
थोमास त्सानोन के बछड़ों को यही सुविधा मिलती है. उन्हें लंबा सफ़र नहीं करना पड़ता है और उन्हें सोया या मक्का खिलाकर मोटा नहीं किया जाता है. वे पहाड़ी चरागाह में चरते हैं और डेयरी इंडस्ट्री से बचे रहते हैं. त्सानोन इटली की बोल्त्सानो यूनिवर्सिटी में लाइवस्टॉक फ़ार्मिंग के प्रोफ़ेसर के असिस्टेंट हैं. वह कहते हैं कि दूध किसी भी लिहाज़ से ओट्स और सोया से बने इसके विकल्पों से कमतर नहीं है. इस तरह ये बछड़े दूध उत्पादन को लेकर नए नज़रिये का नमूना दिखाते हैं.
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