कपाल हस्ता ने किया शीर्शासुर और कबंध राक्षसों का अंत | उद्धार कथा | जय गंगा मैया
May 9, 2026•Channel
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Published1 month ago
Duration23:35
Video IDeNth5Esw06A
Languagehi
CategoryFilm & Animation
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Video TypeRegular Video
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Description
अपने साथी विषासुर की निर्मम हत्या से आहत असुरराज अंधकासुर को लगता है कि उसका वध देवताओं ने छल-कपट से किया है। इसलिए वह शिव जी से प्राप्त शक्ति से त्रिलोक में प्रलय मचा देने का निर्णय लेता है। उसका सेनापति प्राणहंता उसे बताता है कि विषासुर की हत्या देवताओं ने नहीं, देवी गंगा ने की है। तभी अंधकासुर के सेवक शीर्शासुर और कबंध प्रकट होते है, शिर्शासुर का केवल सिर होता है और कबंध सिरकटा घड़। वे अंधकासुर से आज्ञा लेकर देवी गंगा को लाने के लिए ब्रह्माण्ड पहुँच जाते है। देवी उमा उनसे कहती है कि तुमने विषासुर का अंत नहीं देखा। शीर्शासुर और कबंध कहते है कि मुझे भयभीत मत करों, हम असुरेश्वर की आज्ञा से देवी गंगा को लेने आ है। देवी गंगा कहती है कि पुत्र अपनी माता से इस प्रकार की भाषा नहीं बोलते है। यह सुन शीर्शासुर और कबंध कहते है कि न तुम हमारी माता हो और न हम तुम्हारे पुत्र। शीर्शासुर और कबंध अपनी-अपनी शक्तियों से उन दोनों पर प्रहार करने लगते है। प्रति उत्तर में देवी उमा भी अपनी शक्तियों के प्रयोग से उन प्रहारों को विफल कर देती है और उन दोनों राक्षसों का वध करने के लिए देवी मुण्डसर्जा को प्रकट करती है। त्रिशूलधारी मुण्डसर्जा अपनी दिव्य शक्तियों का प्रहार उन राक्षसों पर करती है, लेकिन ये प्रहार राक्षसों की मायावी शक्तियों के प्रहार से विफल हो जाते है। जिसे देख मुण्डसर्जा अपनी बरछी से उन पर प्रहार करती है। बरछी के प्रहार से कबंध के शरीर से खून की बूंदें निकलने लगती है। लेकिन खून की बूंदें भी राक्षसों में परिवर्तित होने लगती है। जिन्हें नष्ट करने के लिए देवी उमा अपने हाथ अनेक देवी शक्तियाँ प्रकट करने के साथ कपाल हस्ता (अपना कटा हुआ सिर हाथ में लिए) को प्रकट करती है। कपाल हस्ता कबंध के शरीर से निकल रह रक्त को पी जाती है, रक्त से बने राक्षसों को खा जाती है। देवी उमा शिर्शासुर और कबंध का अंत करने के लिए शिर्शासुर का सर कबंध के घड़ से जोड़ने का निर्णय लेती है। जिससे शिर्शासुर डर जाता है और वह वापस आकर अंधकासुर को बताता है कि देवी उमा को उसकी मृत्यु का रहस्य पता चल गया है। देवी उमा के बारे में पता चलने पर अंधकासुर अपनी विशाल सेना के साथ स्वयं देवी उमा से लड़ने के लिए चल देता है। अंधकासुर के मायाजाल को समाप्त करने के लिए देवी उमा शीर्शासुर का सिर कबंध के घड़ से जोड़ देती है। यह देख कपाल हस्ता अपने त्रिशूल के प्रहार से शीर्शासुर-कबंध का अंत कर देती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माँ स्वरूपा पतित पावनी गंगा का अवतरण स्वर्ग से पृथ्वी पर मानव कल्याण के लिए हुआ था, उनके तटों पर अनेक तीर्थस्थल, नगर बसे हैं, जहाँ श्रद्धालु स्नान और पूजा-अर्चना करते हैं। गंगा जल के आचमन मात्र ही हृदय को पवित्रता और भक्ति से भर जाता है, इसलिए उन्हें पतितों का उद्धार करने वाली माँ कहा जाता है। उन्हें स्वर्ग से पृथ्वी तक लाने के लिए ऋषि-मुनियों और अनेक राजाओं ने घोर तपस्या की, अनके बाधाएं उत्पन्न हुई और अंत में राजा भगीरथ के प्रयासों से माँ गंगा ब्रह्मा जी के कमण्डल से निकल कर पृथ्वी पर अवतरित हुई। अवतरण की इस प्रकिया में गंगा मैया ने अपने भक्तों और शत्रुओं का उद्धार भी किया इसी उद्धार कथाओं को आपका प्रिय चैनल ‘तिलक’ प्रस्तुत कर रहा है, जिनका भक्ति भाव से आनन्द लीजिए और चैनल से जुड़े रहिए। गंगा मैया आप सभी का कल्याण करें! जय गंगा मैया!
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