बिहार की बेटियाँ 20-25 हज़ार में बिकाऊ हैं? #video #viral #viralvideo #nehasinghrathore
Jan 3, 2026•Channel
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Published5 months ago
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एक घटिया कहावत है कि गरीब की मेहरारू गाँव भर की भौजाई…भाजपा के नेताओं ने इस कहावत को नया रूप देने की कोशिश की है.
जी हाँ…उत्तराखंड सरकार की महिला सशक्तिकरण मंत्री रेखा आर्या के पति गिरधारी लाल साहू ने बिहार की बेटियों की क़ीमत 20-25 हज़ार घोषित कर दी है.
अब बिहार के लोग चाहें तो अपमान का ये घूँट सरकारी राशन की दाल मानकर गटक सकते हैं. अपमान का घूँट ज़्यादा कड़वा लग रहा हो तो इस अपमान को देशहित में अपना योगदान मानकर धीरे-धीरे चाय की तरह सुड़क भी सकते हैं…अमृतकाल की यही तो खासियत होती है…कुछ भी ख़राब नहीं लगता…मल-मूत्र मिला पानी भी अमृत हो सकता है और मोक्ष दिला सकता है…
खैर…अगर बिहार के लोगों को अपनी बेटियों की बोली लगना ख़राब लगा होता तो क्या वो इसका विरोध नहीं करते! क्या वो इस अपमान के ख़िलाफ़ आवाज़ न उठाते? क्या बिहार की सरकार ने उत्तराखंड की सरकार से सवाल नहीं पूछा होता? क्या उस बयान के लिए मुकदमा दर्ज नहीं हुआ होता? क्या बिहार के लोग सड़कों पर न होते?
लेकिन देखिए न! किसी को बुरा नहीं लगा! बुरा लगेगा भी कैसे? बेइज्जत होने की आदत जो पड़ गई है! बिहार के मुख्यमंत्री ने भरे मंच पर बेटी का हिज़ाब खींच लिया था, तब भी किसी को बुरा नहीं लगा था! जनता सरकारी दाल-भात खाकर पड़ी हुई थी और सारे नेता खीसें निपोर कर हंस रहे थे!
तो भैया मेरे…देशभर को तो यही मैसेज गया था न कि बिहार के लोगों को अपनी बेटियों के सम्मान से कोई मतलब नहीं है…जो चाहे करो…जो मन हो बोलो…ये लोग अपमान सहने की आदत डाल चुके हैं.
बिहार के जिन लोगों की बदौलत केंद्र की सरकार चल रही है…जिस बिहार से केंद्र सरकार को भर-भर के मंत्री और थोक भाव में समर्थन मिला हुआ है, अगर उन बिहारवासियों को बुरा लग रहा होता, तो क्या कोई माई का लाल बिहार की बेटियों की बोली लगा सकता था?
मुझे बिहार के लोगों की इस निष्क्रियता से कोई हैरानी नहीं हो रही है…लेकिन मुझे अपने सम्मान की फ़िक्र है और मैं इस बेहूदा बयानबाज़ी को यूँ ही नहीं जाने दूँगी. कहाँ हैं बिहार के वो तमाम बड़के वाले नेताजी लोग जो चुनावों में वोट मांगने आए थे? गीत-गाना-भजन गाकर बिहार को बदलने वाले की बात करने वाले लोग कहाँ ग़ायब हैं? बदल गया बिहार? बिहार की अस्मिता यूँ ही लूट ली जाएगी क्या?
यहाँ बिहार की बेटियों की बोली लग रही है और आप लोग शीतनिद्रा में पड़े हुए हैं? शर्म नहीं आती?
सरकार में बैठे लोग तो बेशर्म हैं ही…क्या विपक्ष में बैठे लोगों को भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता? बिना सत्ता मिले जनता की बात नहीं की जाएगी क्या? एक गरीब आदमी भी अपनी बेटी के सम्मान के लिए लड़ने पर आमदा हो जाता है…लेकिन ये चुप्पी बर्दाश्त नहीं की जाएगी.