क्या ख़त्म कर दें जेलें? क़ैद से बेहतर क्या होगा | DW Documentary हिन्दी

Apr 25, 2026Channel
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Published1 month ago
Duration43:47
Video IDmGVW7GL0T90
Languagehi
CategoryNews & Politics
PrivacyPublic
Made for KidsNo
Video TypeRegular Video

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Description

जर्मनी की जेलों में इस वक़्त क़रीब 58,000 लोग क़ैद हैं. रिहाई के बाद उनमें से आधे से ज़्यादा लोग फिर से जुर्म कर बैठते हैं. ये आंकड़े मौजूदा जेल सिस्टम पर गहरा संदेह पैदा करते हैं. सवाल ये है कि क्या जर्मनी के जेल सिस्टम में कोई बुनियादी गड़बड़ी है? जेल इंसान पर क्या असर डालती है, इसे समझने के लिए पत्रकार फ्रांक ज़ाइबर्ट ख़ुद जेल जाते हैं. कुछ घंटों के लिए उनके पीछे सेल का दरवाज़ा बंद हो जाता है. अपनी “रिहाई” के बाद वो बताते हैं कि अकेलेपन और अचानक अपनी ज़िंदगी पर से नियंत्रण खो देने के एहसास ने उनके लिए सब कुछ बदल दिया. आख़िर जेल से क्या लाभ होता है? वकील और पूर्व जेल डायरेक्टर थोमास गाली कहते हैं: कुछ भी नहीं. वो सलाखों के पीछे बंद 90 फ़ीसदी क़ैदियों को परोल पर रिहा करने के पक्ष में हैं. उनके अनुसार जेल का मतलब है सामाजिक बहिष्कार. ये व्यवस्था बहुत महंगी भी है, जिसमें सरकार एक क़ैदी पर रोज़ाना क़रीब 200 यूरो ख़र्च करती है. कुल-मिलाकर, यह सिस्टम टैक्स देने वालों की गाढ़ी कमाई से हर दिन एक करोड़ यूरो से ज़्यादा निगल जाता है. थोमास गाली चाहते हैं कि ये पैसा अपराधियों के लिए सोशल वर्क और थेरपी में लगाना चाहिए. जेल अधिकारी रेने मुलर, जिन्हें इस पेशे में 20 साल से ज़्यादा का अनुभव है, इस बात से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि अपराधियों को बंद करना सार्वजनिक सुरक्षा, अपराधियों में डर पैदा करने और न्याय की भावना को बनाए रखने के लिए ज़रूरी है. फ्रैंक ज़ाइबर्ट इसी सवाल की पड़ताल करते हैं कि आख़िर सही कौन है? जवाब तलाशने के लिए वो फ्री यूनिवर्सिटी बर्लिन की क्रिमिनल लॉ एक्सपर्ट क्रिस्टीन ड्रेन्क्हान से मिलते हैं. ड्रेन्क्हान शोध कर रही हैं कि जेल के सामाजिक माहौल का पुनर्वास पर क्या असर पड़ता है. एक पूर्व क़ैदी थोमास, जिन्होंने एक महिला की जान लेने की कोशिश की थी, इस माहौल को अपने निजी अनुभव से बयां करते हैं. वो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि जेल इंसान को बदलती तो है, पर ज़्यादातर मामलों में सुधारने के बजाय और बिगाड़ देती है. बर्लिन के माक्स प्लांक इंस्टिट्यूट की न्यूरोसाइंटिस्ट सिमोने क्यून और डुइसबुर्ग/एसेन यूनिवर्सिटी के मनोचिकित्सक योहानेस फ़ुस क़ैदियों के व्यवहार और उनके दिमाग़ में आने वाले बदलावों की जांच कर रहे हैं. ये दुनिया का पहला ऐसा रिसर्च प्रोजेक्ट है, जो ये देख रहा है कि क्या जेल की नीरस ज़िंदगी दिमाग़ के कुछ हिस्सों को सिकोड़ देती है या निष्क्रिय कर देती है. क्या जेल लोगों को बेहतर बनाने के बजाय और बीमार कर रही है? नॉर्वे में 1980 के दशक के आख़िरी में जब दोबारा अपराध करने की दर बहुत ज़्यादा थी, तब वहां के न्याय मंत्री ने भी यही सवाल पूछा था. जवाब के लिए विशेषज्ञों की एक टीम बनाई गई, जिसमें वकील आर हेइडाल भी शामिल थे. फ्रांक ज़ाइबर्ट स्टावेंगर के पास एक जेल में हेइडाल से मिलते हैं. ये जेल "नॉर्मैलिटी प्रिंसिपल" पर चलती है. इसका मतलब है कि क़ैदियों पर उतनी ही पाबंदियां लगाई जाती हैं, जितनी समाज की सुरक्षा के लिए अनिवार्य हों, और उनके साथ सम्मान व दयाभाव से बर्ताव किया जाता है. जो क़ैदी सहयोग करते हैं, जो कि ज़्यादातर क़ैदी करते ही हैं, उन्हें कुछ समय बाद रिहायशी इलाक़े में जाने की इजाज़त मिल जाती है. वहां वे बिना सलाखों के छोटी कम्युनिटीज़ में रहते हैं. #dwdocumentaryहिन्दी #dwहिन्दी #dwdocs #jail #convicts #law ---------------------------------------------------------------------------------------- अगर आपको वीडियो पसंद आया और आगे भी ऐसी दिलचस्प वीडियो देखना चाहते हैं तो हमें सब्सक्राइब करना मत भूलिए. विज्ञान, तकनीक, सेहत और पर्यावरण से जुड़े वीडियो देखने के लिए हमारे चैनल DW हिन्दी को फॉलो करे: @dwhindi और डॉयचे वेले की सोशल मीडिया नेटिकेट नीतियों को यहां पढ़ें: https://p.dw.com/p/MF1G

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