लवणासुर राक्षस का वध करके शत्रुघ्न ने ऋषियों का किया उद्धार | रामायण | उद्धार कथा

Jun 20, 2026Channel
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Description

लवणासुर प्रातःकाल ऋषियों और पशुओं को खाने के लिए निकलता है, लेकिन उस समय अपने साथ भगवान शिव से प्राप्त त्रिशूल को नहीं ले जाता है। अतः शत्रुघ्न योजनानुसार इसी समय का फायदा उठाते हुए मधुरा नगरी के द्वार पर पहुँच जाते है और लवणासुर को युद्ध के लिए ललकारते है। लवणासुर बहाना बनाते हुए भगवान शिव से प्राप्त दिव्य त्रिशूल लेने के लिए महल जाना चाहता है, लेकिन शत्रुघ्न उसकी मंशा जानते थे, इसलिए वह लवणासुर को तुरन्त युद्ध करने के लिए उकसाते है। दोनों ओर से बाणों के प्रहार प्रारम्भ हो जाते है, कभी लवणासुर का बाण भारी पड़ता है, तो कभी शत्रुघ्न का बाण। युद्ध खत्म होने का नाम ही नहीं लेता है। लवणासुर शत्रुघ्न पर अग्नि युक्त बाणों से प्रहार करने लगता है, जिससे बचने के लिए शत्रुघ्न को इधर-उधर भागना पड़ता है। अंततः लवणासुर को रोकने का कोई उपाय न देख शत्रुघ्न श्रीराम के द्वारा प्रदान किए गए भगवान विष्णु के बाण का आह्वान करते है और उसे लवणासुर पर चला देते है। वह दिव्य बाण लवणासुर की जीवन लीला समाप्त कर देता है। लवणासुर के मरते ही उसे भगवान शिव से प्राप्त हुआ त्रिशूल वापस भगवान शिव के पास पहुँच जाता है। जिसे देख लवणासुर की पत्नी समझ जाती है कि लवणासुर का अंत हो गया है। इस प्रकार शत्रुघ्न ने भगवान विष्णु के बाण की सहायता से ऋषि-मुनियों को रक्षा करके उनका उद्धार किया। वेद-पुराणों और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार परम ईश्वर श्री हरि ने समय-समय पर धर्म की हानि को रोकने और अधर्म के विनाश करने के लिए मानव रूप में अवतार लिया और मानव कल्याण के लिए धर्म की पुनःस्थापना की तथा साथ-साथ अपने भक्तों का उद्धार भी किया। क्योंकि अवतार लेने का उद्देश्य केवल अधर्मियों का विनाश करना ही नहीं होता था बल्कि जनमानस में ईश्वर के प्रति भक्ति और उनके विश्वास को दृढ़ करना भी था। भगवान श्री राम ने जब त्रेतायुग में अवतार लिया, तब उन्होंने केवल रावण का वध ही नहीं किया बल्कि इस अवतार के माध्यम से अपने अनेकों भक्तों का उद्धार भी किया। आपका प्रिय धार्मिक चैनल तिलक अपनी इस शृंखला में भगवान श्री राम के द्वारा किए अपने भक्तों के उद्धार की कथाओं को प्रस्तुत कर रहा है। भक्ति भाव से इनका आनन्द लीजिए और तिलक से जुड़े रहिए। #shreeram#ramayan #katha #uddharkatha #ramayanuddharkatha

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